Wednesday, February 2, 2011

मुहम्मद इक़बाल

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा



हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिसतां हमारा


गुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में


समझो वहीं हमें भी, दिल हो जहाँ हमारा


परबत वो सबसे ऊँचा, हमसाया आसमाँ का


वो संतरी हमारा, वो पासवां हमारा


गोदी में खेलती हैं, जिसकी हज़ारों नदियाँ


गुलशन है जिसके दम से, रश्क-ए-जिनां हमारा


ऐ आब-ए-रौंद-ए-गंगा! वो दिन है याद तुझको


उतरा तेरे किनारे, जब कारवां हमारा


मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना


हिन्दी हैं हम वतन हैं, हिन्दोस्तां हमारा


यूनान, मिस्र, रोमां, सब मिट गए जहाँ से ।


अब तक मगर है बाकी, नाम-ओ-निशां हमारा


कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी


सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहाँ हमारा


'इक़बाल' कोई मरहूम, अपना नहीं जहाँ में


मालूम क्या किसी को, दर्द-ए-निहां हमारा


सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा


हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिसतां हमारा ।





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