जब हम छोटे थे तो नानी के घर टिमरनी जाया करते थे। वहाँ सारे मामा और मौसी के बच्चे इकठ्ठे होते थे। यही कोई 50 लोग हो जाते थे। वो भी केवल घर ही घर के। बड़ा मजा आता था। लेकिन, आज तो सब ख़त्म हो गया। कोई नहीं आता जाता हैं। कुछ नहीं बचा है। न नानी रही। और अब तो कोई आता जाता भी नहीं है ज़्यादा। अब क्या कर सकते हैं...
ये बातें मैं कुछ न कुछ दिनों में मम्मी के मुंह से सुन ही लेती थी। सोचकर लगता था कि पता नहीं कैसा था मम्मी की नानी का घर पहले। क्योंकि मैं तो जब भी गई मुझे कुछ ख़ास मज़ा नहीं आया। हाँ, मुझे मज़ा आता था देवास में। अपनी नानी के घर में। गर्मी की छुट्टियों में जब हम वहाँ जाते थे और मौसियों और मामाओं के सारे बच्चे जुड़ते थे। क्या धमाल होती थी। तब मम्मी की बातें सुनकर लगता था चलो ठीक है। लेकिन, देवास तो हमेशा यूँ ही आबाद रहेगा। हम हमेशा यूँ ही रहेंगे। देवास की रौनक कुछ यूँ थी कि... सुबह-सुबह उठना। टेकरी पर चढ़ना। बिना नहाए धुआए ही माता के दर्शन करना। रेस लगाना कि कौन कितना भाग सकता हैं। फिर घर आना साथ में मिलकर आंगन में नहाना। मामी का नाश्ता बनाकर खिलाना। फिर खाने के लिए मामा का इंतज़ार। जब वो बीएनपी(बैंक नोट प्रेस) से आते खाना खाने तब उनकी एक प्लेट पर ही हम बीसीयों का टूट पड़ना। आई (नानी) का मामा को डाँटना कि मत खिला साथ में भांजे भांजियों को कर्ज़ चढ़ेगा। फिर दादा (नाना) के साथ बातें करना। कहानियाँ सुनना। रोज़ रात को मेंहदी लगाकर सोना... मेरा ननिहाल हमेशा यूँ ही रहेगा...
लेकिन, मेरी ये सोच कुछ वैसे ही बदल गई जैसे कि मेरी मम्मी की। आज मैं भी हर किसी को यही कहती हूँ कि...
जब हम छोटे थे तो नानी के घर देवास जाया करते थे। वहाँ सारे मामा और मौसी के बच्चे इकठ्ठे होते थे। यही कोई 50 लोग हो जाते थे। वो भी केवल घर ही घर के। बड़ा मजा आता था। लेकिन, आज तो सब ख़त्म हो गया। कोई नहीं आता जाता हैं। कुछ नहीं बचा है। और अब तो कोई आता जाता भी नहीं है ज़्यादा। अब क्या कर सकते हैं...
इस बार जब देवास गई तो लगा कि किसी विरान जगह पर आ गई हूँ। अब कोई यहाँ एक साथ इकठ्ठा नहीं होता हैं। सब अपनी ज़िंदगियों में व्यस्त हो चुके हैं। मेरे घर में घुसते ही दादा ने कहा - कितने दिन हो गए थे तुम्हें देखें। आई हो तो रुकोगी न यहां कुछ दिन। मैंने ना में सर हिलाकर कहा - नहीं दादा कल ही वापसी है। दादा कुछ न बोले। आई इतनी कमज़ोर लग रही थी। फिर भी सुन्दर। गोरे से मुखड़े पर गोल लाल बिन्दी में। लेकिन, अकेली बैठी हुई थी। घर में मामा है मामी है, एक कज़िन है जो कि वही नौकरी कर रही है। लेकिन, सब व्यस्त भी है। तीनों ही नौकरी करते हैं। सुबह जाना शाम को आना। दिनभर आई-दादा अकेले। जब मैं और मम्मी निकल रहे थे। मन में लगा कि रुक जाऊँ कुछ दिन। कैसे रहते हैं ये दोनों यूँ अकेले... लेकिन, मैं नहीं रुक सकती थी।
घर से निकल कर जब बस में बैठे तो मम्मी ने कहा - कितनी रौनक रहती थी इस घर में देखो आज दोनों अकेले हैं। कल तो ये भी न होगें। फिर तो ये घर, घर ही न लगेगा। मैं कुछ नहीं बोल पाई। बस आंख में आंसू आ गए, ये सोचकर कि शायद ये भी एक दिन मुझे कहना है..
ये बातें मैं कुछ न कुछ दिनों में मम्मी के मुंह से सुन ही लेती थी। सोचकर लगता था कि पता नहीं कैसा था मम्मी की नानी का घर पहले। क्योंकि मैं तो जब भी गई मुझे कुछ ख़ास मज़ा नहीं आया। हाँ, मुझे मज़ा आता था देवास में। अपनी नानी के घर में। गर्मी की छुट्टियों में जब हम वहाँ जाते थे और मौसियों और मामाओं के सारे बच्चे जुड़ते थे। क्या धमाल होती थी। तब मम्मी की बातें सुनकर लगता था चलो ठीक है। लेकिन, देवास तो हमेशा यूँ ही आबाद रहेगा। हम हमेशा यूँ ही रहेंगे। देवास की रौनक कुछ यूँ थी कि... सुबह-सुबह उठना। टेकरी पर चढ़ना। बिना नहाए धुआए ही माता के दर्शन करना। रेस लगाना कि कौन कितना भाग सकता हैं। फिर घर आना साथ में मिलकर आंगन में नहाना। मामी का नाश्ता बनाकर खिलाना। फिर खाने के लिए मामा का इंतज़ार। जब वो बीएनपी(बैंक नोट प्रेस) से आते खाना खाने तब उनकी एक प्लेट पर ही हम बीसीयों का टूट पड़ना। आई (नानी) का मामा को डाँटना कि मत खिला साथ में भांजे भांजियों को कर्ज़ चढ़ेगा। फिर दादा (नाना) के साथ बातें करना। कहानियाँ सुनना। रोज़ रात को मेंहदी लगाकर सोना... मेरा ननिहाल हमेशा यूँ ही रहेगा...
लेकिन, मेरी ये सोच कुछ वैसे ही बदल गई जैसे कि मेरी मम्मी की। आज मैं भी हर किसी को यही कहती हूँ कि...
जब हम छोटे थे तो नानी के घर देवास जाया करते थे। वहाँ सारे मामा और मौसी के बच्चे इकठ्ठे होते थे। यही कोई 50 लोग हो जाते थे। वो भी केवल घर ही घर के। बड़ा मजा आता था। लेकिन, आज तो सब ख़त्म हो गया। कोई नहीं आता जाता हैं। कुछ नहीं बचा है। और अब तो कोई आता जाता भी नहीं है ज़्यादा। अब क्या कर सकते हैं...
इस बार जब देवास गई तो लगा कि किसी विरान जगह पर आ गई हूँ। अब कोई यहाँ एक साथ इकठ्ठा नहीं होता हैं। सब अपनी ज़िंदगियों में व्यस्त हो चुके हैं। मेरे घर में घुसते ही दादा ने कहा - कितने दिन हो गए थे तुम्हें देखें। आई हो तो रुकोगी न यहां कुछ दिन। मैंने ना में सर हिलाकर कहा - नहीं दादा कल ही वापसी है। दादा कुछ न बोले। आई इतनी कमज़ोर लग रही थी। फिर भी सुन्दर। गोरे से मुखड़े पर गोल लाल बिन्दी में। लेकिन, अकेली बैठी हुई थी। घर में मामा है मामी है, एक कज़िन है जो कि वही नौकरी कर रही है। लेकिन, सब व्यस्त भी है। तीनों ही नौकरी करते हैं। सुबह जाना शाम को आना। दिनभर आई-दादा अकेले। जब मैं और मम्मी निकल रहे थे। मन में लगा कि रुक जाऊँ कुछ दिन। कैसे रहते हैं ये दोनों यूँ अकेले... लेकिन, मैं नहीं रुक सकती थी।
घर से निकल कर जब बस में बैठे तो मम्मी ने कहा - कितनी रौनक रहती थी इस घर में देखो आज दोनों अकेले हैं। कल तो ये भी न होगें। फिर तो ये घर, घर ही न लगेगा। मैं कुछ नहीं बोल पाई। बस आंख में आंसू आ गए, ये सोचकर कि शायद ये भी एक दिन मुझे कहना है..
No comments:
Post a Comment